
मुकेश जैन
किसी शहर का सर्वांगीण विकास एक जटिल और श्रम-साध्य मसला है, विशेषकर किसी पुराने बसाहट वाले शहर का व्यवस्थित विकास बहुत ही पेचीदा होता है। इसके लिये शहरवासियों की जरूरतों की ठीक-ठीक समझ, वहाँ की पारिस्थितिक विशेषताओं, सांस्कृतिक परिवेश, परंपराओं व विरासत के साथ संतुलन स्थापित करना , इसके ठीक समानांतर आधुनिक भविष्य की जरूरतों के साथ भी तालमेल कायम रख पाना और इन सबके बीच ठोस व समयबद्ध कार्ययोजना का निर्माण तथा योजनाओं को धरातल पर उतारने का आवेगपूर्ण संकल्प, सभी का एकजायी होना आवश्यक होता है। यह सुखद संयोग है कि रायगढ़वासियों को इन सभी विशिष्ट योग्यताओं से परिपूर्ण ओ पी चौधरी का कुशल नेतृत्व मिला है और इस अंचल से दिली-लगाव रखने वाले विष्णु देव साय मुख्यमंत्री के रूप में हमारे साथ हैं। कहते हैं कि जब नेतृत्व सबल, नियत साफ और सोच बड़ी हो तो जनता के सपनों को न केवल पंख लग जाते हैं वरन एक-एक करके सपने साकार भी होने लगते हैं। रायगढ़ में विगत ढाई वर्षों से चल रहे विकास कार्यों की लंबी श्रृंखला इसकी बानगी है। इस श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में शहर के हृदय स्थल में नवनिर्मित बेहतरीन ऑक्सीजोन कल मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के करकमलों से आमजनता को अर्पित हुआ है। निश्चित रूप से यह अवसर रायगढ़ के नव-विकास के शिल्पी ओ पी चौधरी की पीठ थपथपाने और हमारे लाड़ले मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का आभार व्यक्त करने का क्षण है। यह रायगढ़ के चेहरे पर एक मीठी व लम्बी मुस्कान बिखरने का क्षण है। *अतीत की उपेक्षा और नया संकल्प*- जब हम रायगढ़ के अतीत पर नजर डालते हैं तो हम पाते हैं कि मध्यप्रदेश के धूर-पूर्वी छोर का अंतिम शहर होने के कारण हमारा रायगढ़ दशकों तक भोपाल में बैठे नीति-निर्धारकों की दृष्टि से लगभग ओझल ही रहा। रायगढ़ को 1901 में नगरपालिका परिषद का दर्जा मिला। तब से लेकर 2001 तक 100 वर्षों के लंबे कालखण्ड में रायगढ़ बेहद मंथर गति से यात्रा करता रहा। मध्यप्रदेश के बड़े शहरों की ओट में दुबक कर रायगढ़ यथास्थिति में रहने का अभिशाप झेलता रहा। हमारे आस-पास के रायपुर, बिलासपुर, भिलाई, दुर्ग भी विकास के मामले में हमसे काफी आगे निकल गये। अटल जी द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य की सौगात दिये जाने के बाद परिस्थितियां बदली। 2002 में रायगढ़ को निगम का दर्जा हासिल हुआ। 2003 में नये नेतृत्व को काम करने का मौका मिला और रायगढ़ उपेक्षा के दौर से बाहर निकलकर विकास की दहलीज छूने लगा। इस दौर में कतिपय उल्लेखनीय काम जरूर हुये लेकिन 100 वर्षों के बैकलॉग के सामने ये नाकाफी थे। चूंकि लंबे समय की जड़ता थी इसलिये विकास की मुख्यधारा में लाने के लिये फुटकर प्रयासों से काम नहीं चलने वाला था। उसे एकमुश्त बड़ी छलांग लगाने की जरूरत थी और इस सिद्धि के लिये रायगढ़ किसी ताकतवर एवं सक्षम उद्धारक की बांट जोह रहा था। उनकी वर्षों की यह तलाश ओ पी चौधरी तक आकर पूर्ण हुई है। रायगढ़ के वृहत काया-कल्प हेतु चल रहे सौ से अधिक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स और उन पर ताबड़-तोड़ एक्शन इस बात के जीवंत प्रमाण हैं। विगत दो-ढाई वर्षों के अनथक क्रियाकलापों से ओ पी ने ‘एक ही राजनीति- विकास की राजनीति’ के मूलमंत्र को कार्य रूप में सिद्ध करके दिखाया है। विकास अपने-आप में एक विस्तृत व बहुआयामी अवधारणा है। ओ पी चौधरी के लिये विकास का आशय केवल बड़े व मेगा प्रोजेक्ट्स को मूर्तरूप देने तक सीमित नहीं है वरन आम लोगों के आर्थिक व सामाजिक जीवन का उत्थान व जीवन की गुणवत्ता में सकारात्मक बदलाव उनके लिये विकास का असली पैमाना है।*विकास कार्यों की लंबी श्रृंखला-* नालन्दा परिसर, केलो-नहर निर्माण, प्रस्तावित रिंग रोड, मेरीन ड्राइव, स्टेडियम का उन्नयन, हॉर्टिकल्चर कॉलेज, प्रयास विद्यालय, आधुनिक बस स्टैंड, रेल्वे स्टेशन का आधुनिकीकरण, सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट, सीवरेज, सड़क, पुल-पुलियों के साथ ही पहाड़ मंदिर का ईको-सेंटर की तर्ज पर विकास , उर्दना में नगर -वन की स्थापना और शहर के चारों ओर अलग-अलग ऑक्सीजोन का निर्माण यह दर्शाता है कि ओ पी चौधरी लोगों के जीवन में गुणवत्तापूर्ण बदलाव को लेकर कितने संजीदा हैं। *बहुपयोगी सुविधाओं से लैस ऑक्सीजोन* -शहर के बीचों- बीच इतवारी बाजार और कृषि-उपज मंडी का बड़ा भूखंड लगभग अनुपयोगी सा पड़ा था। इस पर कभी मल्टीस्टोरी शापिंग काम्प्लेक्स व मल्टी लेबल आधुनिक पार्किंग की योजना बनी और कभी ऑडिटोरियम निर्माण की योजना बनी लेकिन विभिन्न विभागों में सामंजस्य की कमी और राजनीतिक अड़ंगेबाजी के कारण कोई भी योजना परवान नहीं चढ़ सकी। इस बेशकीमती भूखंड का व्यावसायिक उपयोग करके शासन इसे बड़े आर्थिक रिटर्न व एक नियमित आय का जरिया बना सकती थी लेकिन ओ पी चौधरी ने इसे आम जनता के हितार्थ ऑक्सीजोन के लिये चुना और इसके बहुपयोगी स्वरूप की परिकल्पना की तो उसके पीछे गहरी सोच व गूढ़ निहितार्थ हैं। शहर के आस-पास उद्योगों की स्थापना, शहर के भीतर वृहत कांक्रीटीकरण और बड़ी संख्या में वाहनों की आवाजाही आदि कारणों से शहर में कार्बनडाइऑक्साइडका स्तर अपेक्षाकृत अधिक होता है। अलग-अलग स्थानों में ऑक्सीजोन के निर्माण के द्वारा ऑक्सीजन का स्तर बढ़ाना आम तौर पर पर्यावरणीय संतुलन कायम करने का एक समाधानकारक व बेहतर विकल्प होता है। नवनिर्मित ऑक्सीजोन में विशेषज्ञों की सलाह पर अधिक ऑक्सीजन उत्सर्जन करने वाले पेड़-पौधे लगाये गये हैं, बच्चों के मनोरंजन हेतु झूले-फिसलपट्टी आदि की व्यवस्था है, योग हेतु अलग मंच, ओपन एयर थिएटर सहित वॉकिंग ट्रैक भी है। इससे लगकर एक गेम- जोन व फ़ूडकोर्ट और व्यवस्थित पार्किंग का निर्माण भी किया गया है। संक्षेप में, जहां एक ओर यह ऑक्सीजोन काफी हद तक प्रदूषण से राहत देने वाला केंद्र होगा वहीं दूसरी ओर यह सैर-सपाटे, योग, स्वच्छ हरित पट्टिका, वॉकिंग, कला मंचन आदि की सुविधाओं से लैस उपयोगी स्वास्थ्य केंद्र , कम्युनिटी मीटिंग और कलात्मक व सांस्कृतिक मेल-जोल के केंद्र के रूप में भी उपयोगी सिद्ध होगा।*मुख्यमंत्री साय की मंशा के अनुरूप हुआ नामकरण* – इस ऑक्सिजोन के साथ एक विशिष्ट और उल्लेखनीय विषय इसके नाम का चयन भी है। विदित हो कि पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा काश्मीर घाटी में भारतीय महिलाओं के सामने ही उनका सिंदूर मिटा दिया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साहसी नेतृत्व में भारतीय सेना ने अद्भूत शौर्य का प्रदर्शन करते हुये ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम दिया और पाकिस्तान को ऐसा मुँह-तोड़ जवाब दिया था कि पूरा विश्व अचंभित हो गया। ऑक्सीजोन का नाम सिंदूर पार्क रखकर न केवल उस आतंकी घटना में शहीद हुये 26 निर्दोष भारतीय नागरिकों को एक विनम्र श्रद्धांजलि दी गयी है वरन यह उन बहनों को भावपूर्ण संदेश भी है कि देशवासी उनके पतियों के बलिदान को भूले नहीं हैं। यह नामकरण भारतीय सेना के तीनों विंग के जवानों व महिला सैनिकों के अदम्य साहस को एक गर्वीला सैल्यूट भी है। एक पार्क को इस तरह से एक राष्ट्रीय संदर्भ से जोड़ देने के पीछे मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अभिनव सोच मुख्य कारक बनी। इसके लिये वे साधुवाद के पात्र हैं।*कंटीले रास्तों पर चलकर मिला है ऑक्सीजोन*- किसी पुराने शहर में एक स्थापित स्थल के परंपरागत उपयोग को परिवर्तित करना जोखिम भरा कदम होता है। इसके लिये अनेक तरह-तरह के आरोपों व उलाहनों का सामना करना पड़ता है। इतवारी बाज़ार ऑक्सीजोन के निर्माण को भी इसी तरह के कठिन रास्ते से गुजरना पड़ा है। चूंकि योजना के मूल में व्यापक जनहित की स्पष्ट मंशा काम कर रही थी अतः आरंभिक अड़चनों के बावजूद जब योजना ने मूर्त-रूप ले लिया तो रायगढ़ के बाशिंदों ने बाँहे फैलाकर इसका स्वागत करने में भी कोई कंजूसी नहीं दिखाई है । आज चौक-चौराहों में ओ पी चौधरी के इस पहल की दिल खोलकर प्रशंसा हो रही है।*इन अधिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका* – आज यदि हम कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी, एस डी एम महेश शर्मा, नगर निगम के कर्मठ व सक्रिय आयुक्त बृजेश क्षत्रिय व हाऊसिंग बोर्ड के ई.ई. अभिषेक मोहन तिवारी को याद नहीं करेंगे तो ऑक्सीजोन निर्माण की कहानी अधूरी रह जायेगी। तमाम तरह के झंझावातों से जूझकर इसे पूरा करना बहुत ही कठिन व दुरूह टास्क था। यह दुष्कर कार्य रिकॉर्ड समय में पूर्ण होकर यदि आज जनता को समर्पित हो पाया है तो इसके पीछे इन अधिकारियों की दिन-रात की मेहनत है। वे भी इसके लिये धन्यवाद के पात्र हैं।*ऑक्सिजोन के प्रति नागरिक कर्तव्य*- यदि शासन और प्रशासन रायगढ़वासियों की जरूरतों को लेकर दिन-रात एक कर रहे हैं तो यह जिम्मेदारी हमारी भी बन जाती है कि हम इस पार्क की स्वच्छता, यहाँ की साफ-सफाई, साधनों की सुरक्षा व रख-रखाव का ध्यान एक जिम्मेदार नागरिक की तरह रखें। यह शहर हम सबका है और इसे आगे बढ़ाना हम सबकी साझा जिम्मेदारी है। कोई व्यवस्था अंतिम रूप से जनभागीदारी के बिना टिकाऊ नहीं रह सकती है। अतः आइये, हम सब संकल्पित हों कि निर्माण यदि शासन की जबावदेही है तो उसकी सुरक्षा व बेहतर उपयोग करना हमारा कर्तव्य होगा।*मुकेश जैन*





