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मणिपुर : वर्चस्व की लड़ाई में दांव पर लगा स्त्रीत्व….हिंसा बर्दाश्त करना मणिपुर की नियति नहीं, बंद हो इसका राजनीतिकरण

आशा त्रिपाठी,

रायगढ़ :- मणिपुर पर चर्चा तो होनी ही चाहिए। चाहे वह संसद हो, विधानसभा हो, कोई चैनल या फिर सोशल मीडिया, नहीं होनी चाहिए तो वह राजनीति है पर अफसोस कि मणिपुर पर सिर्फ और सिर्फ राजनीति ही हो रही है। यदि विपक्ष ने यह मुद्दा उठाया है तो जवाब तो देना ही होगा। उनके अनुसार मणिपुर यदि जल रहा था तो मणिपुर नहीं पूरा भारत जल रहा था क्योंकि मणिपुर भारत ही है। यह कथन एक प्रश्नचिन्ह भी उत्पन्न करता है कि यह बात मणिपुर की तरह देश के पूरे राज्यों पर भी लागू होना चाहिए क्योंकि स्त्रीत्व पर जो मुद्दा उठाया गया वह पूरे भारत में एक सा है। इसलिए किसी राज्य विशेष की स्त्रियों को हथियार बनाना उचित नहीं। पूर्वोत्तर राज्यों की स्त्रियां अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा मुखर और उन्मुक्त होती हैं। मेरा यह आंकलन है कि पूर्वोत्तर के अनेक राज्यों में पुरूषों की तुलना में स्त्रियों का वर्चस्व अधिक है और यहां यदि ऐसी घटना हो तो वह पूर्वोत्तर ही नहीं पूरे देश को शर्मसार करती है। जिस दिन हमारा देश या समाज महिलाओं को जायज सम्मान और सुरक्षा देना शुरू करेगा स्त्रियों से संबंधित समस्याओं का समाधान खुद-ब-खुद होने लगेगा। स्त्रियों का एक नैसर्गिक गुण होता है वह सम्मान और सुरक्षा देने वालों को आजीवन नहीं भूलती। अब संसद में जो चर्चाएं हुईं वह स्त्री सम्मान और सुरक्षा से कितनी जुड़ी थी जिसके लिए मणिपुर को ही निशाना बनाया गया ? यह समझ से परे तो नहीं है पर हम समझना ही नहीं चाहते। मेरा ऐसा कहना गलत हो सकता है पर जितना मैंने मणिपुर को समझा है मणिपुर की लड़ाई वर्चस्व की लड़ाई है। नशे के व्यापार को हथियाने की कवायद है। इसमें विदेशी ताकतों की संलग्नता को नकारा नहीं जा सकता। मणिपुर की लड़ाई ड्रग इकॉनामी, हथियार तस्करी, घुसपैठिये या फिर खालिस्तान की तरह अलग राज्य बनाने की पुरजोर कोशिश है जिसका पहले निराकरण जरूरी है। राजनीतिक दल इस मुद्दे को अपने-अपने हिसाब से भुना रहे हैं।

जब विपक्ष मणिपुर के दर्द को बयां कर रहा था तो उनमें दर्द से अधिक आक्रोश सत्ता को हथियाने का स्पष्ट दिख रहा था। जिस मणिपुर के मुद्दे को लेकर विपक्ष प्रधानमंत्री को संसद में बुलाने की जिद पर अड़ा था वह बेतुका सा था और अविश्वास प्रस्ताव लाने का हश्र क्या होगा इसे जानते हुए भी इसे लाया जाना हास्यास्पद ही था। विपक्ष का निर्मम चेहरा और भी स्पष्ट तब हो गया जब 90 वर्षीय भूतपूर्व प्रधानमंत्री आदरणीय मनमोहन सिंह जी ( जिन्होंने अपने कार्यकाल में अनेक महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया और अंतिम 10 वर्ष प्रधानमंत्री के रूप में गुजारा) को उनकी अस्वस्थता के बावजूद संसद में घंटो बैठायागया। उल्लेखनीय है कि आदरणीय मनमोहन सिंह जी को पूर्वोत्तर राज्यों से चुना जाकर ही संसद में प्रवेश मिला था। जिस पूर्वोत्तर के मणिपुर के लिए विपक्ष बैचेन था वहीं से चुने गए सांसद ने 10 वर्ष का कार्यकाल देश के प्रधानमंत्री के रूप में गुजारे थे। हिंसा तब भी होती थी। हिंसा बर्दाश्त करना पूर्वोत्तर की नियति ही रही। जिसका दुष्परिणाम भुगतते हैं सामान्य बेकसूर नागरिक या फिर देशभक्त फौजी। अक्सर इन्हें टूल बनाया जाता है।बेशक वर्तमान राज्य सरकार ने मणिपुर को नियंत्रित करने के प्रयास किये पर कीमती चुकाई हम जैसे साधारण परिवार के बेटे ने। पता नहीं यह आर्मी इंटेलिजेंस फेल्योर था या राज्य शासन के सुरक्षा नियमों की चूक पर मेरे बेटे ने तो परिवार सहित बलिदान दिया जो अपने आप में पहली घटना थी। जिसकी फौज, राज्य शासन और केंद्र शासन तीनों ने अनदेखी की। दुख इसी बात का है। जिस तिरंगा को फहराते वक्त नेताओं को गर्व की अनुभूति होती है वहीं तिरंगे से लिपटकर जब कोई घर आता है तो परिवार की पीड़ा को राजनेताओं क्या उसी शिद्दत से महसूस कर पाते हैं? मेरे वजूद का एक बड़ा हिस्सा मुझसे कट गया अपने इस जख्मी और आधे-अधूरे व्यक्तित्व के साथ सामान्य होने की प्रक्रिया से गुजर रही हूं तो इसमें मेरे परिवार, मेरे समाज से ज्यादा उन लोगों का सहयोग है जिन्हें मैं सिर्फ जानती थी।आभारी रहूंगी असम राईफल्स की जो नियमित रुप से हमारी खोज खबर लेते रहते है।

दरअसल संस्कार आपकी परवरिश दर्शाते हैं और भाषा आपकी शिक्षा (शिक्षा से मेरा अभिप्राय कागज के टुकड़ों से नहीं)। आपकी भाषा और व्यवहार आपके व्यक्तित्व का आइना होती है जिसकी सर्वाधिक जरूरत भाषायी प्रदूषण से व्याप्त आज की राजनीति और राजनेताओं को है इसका ज्वलंत प्रमाण है संसद को मजाक बनाना, बेतुकी जिद पर अड़े रहना, मनचाही बात न होने पर वॉक आउट कर जाना। अब तो एक नई परंपरा भी चल पड़ी है श्राप देने की। बेहतर होता इसकी जगह वरदान मांगने की क्षमता विकसित करते। मानसून सत्र में हमारे द्वारा भेजे गए जनप्रतिनिधियों ने हमारे ही (जनता) द्वारा कठिन परिश्रम से अर्जित पैसों का दुरुपयोग किसी बलात्कारी की तरह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। स्त्री अस्मिता का मुद्दा पूरी तरह हाशिये पर चला गया देश जिसे हम माता कहते हैं भारत माता के जयकारे भी लगाते हैं(मां, स्त्री का सर्वश्रेष्ठ रूप है)पर यह सत्र स्त्रीत्व को लेकर कितनी जागरूक रहा इसकी गवाही देगा।

मणिपुर का मौजूदा दौर खत्म हो जाएगा, स्थिति सामान्य हो जाएगी, वह आगे बढ़ेगा,वह खूबसूरत हो जाएगा।पचहत्तर सालों बाद बार्डर पर फेन्सिंग की शुरुआत भी हो चुकी है लेकिन जब कभी मुझे मणिपुर की याद आएगी तब मेरी आंखों के सामने मेरे जिगर के तीनों टुकड़े का चेहरा ही होगा।

आशा त्रिपाठी
(शहीद कर्नल विप्लव त्रिपाठी, शहीद अनुजा त्रिपाठी और बाल शहीद अबीर की मां)

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