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डिजिटल लोन का मायाजाल : रायगढ़ ( छत्तीसगढ़ ) में कर्ज , तमिलनाडु / दिल्ली में मुकदमा और कानून का दुरुपयोग….तकनीक और शोषण का नया गठजोड़

रायगढ़:- सूचना क्रांति के इस युग में वित्तीय सेवाओं का लोकतंत्रीकरण हुआ है। आज ‘फिनटेक’ ( Fintech ) कंपनियों के माध्यम से देश के रायगढ़ व अन्य आदिवासी बाहुल्य और विकासशील जिलों के नागरिकों के लिए मोबाइल के एक क्लिक पर ऋण (Loan) उपलब्ध है। लेकिन इस सुगमता के पीछे एक काला पक्ष भी है। जब कोई ऋणी विपरीत आर्थिक परिस्थितियों के कारण किश्त (EMI) चुकाने में असमर्थ होता है, तो ये कंपनियां कानून की प्रक्रियाओं का उपयोग ‘हथियार’ के रूप में करने लगती हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ऋण रायगढ़ में दिया जाता है, लेकिन आपराधिक मामले हजारों किलोमीटर दूर तमिलनाडु, कर्नाटक या तेलंगाना जैसे राज्यों में दर्ज कराया जाता है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 316(2) और 318(4) ‘आपराधिक विश्वासघात'(criminal breach of trust) एवं “धोखाधड़ी”(cheating) का भय दिखाकर आम नागरिकों का मानसिक और आर्थिक शोषण किया जा रहा है।
इन कंपनियों का तर्क होता है कि ऋणी ने शुरू से ही रकम हड़पने की नीयत से फर्जी दस्तावेज दिए या तथ्यों को छिपाया।
यथार्थ: विधि के प्रतिपादित सिद्धांत के अनुसार ऋण न चुका पाना (Default) एक ‘सिविल दायित्व/ लायबिलिटी’ है, न कि ‘आपराधिक कृत्य’। जब तक कि ऋणी की मंशा (Mens – Rea) शुरुआत से ही धोखाधड़ी की न हो, तब तक ये धाराएं लागू नहीं होनी चाहिए।
वित्तीय कंपनियां जानबूझकर सुदूर राज्यों में FIR दर्ज कराती हैं। इसके पीछे उनका उद्देश्य न्याय पाना नहीं, बल्कि ऋणी को इतना डराना और थकाना है कि वह दबाव में आकर समझौता कर ले। इसे कानूनी भाषा में ‘Forum Shopping’ कहा जाता है।
1 • कानून का सिद्धांत: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 197 स्पष्ट करती है कि किसी भी अपराध की जांच और विचारण (Trial) उसी क्षेत्र की अदालत में होगा जहाँ वह अपराध हुआ है।

  • यदि ऋणी रायगढ़ का निवासी है, उसने यहीं रायगढ़ में ही बैठकर ऑनलाइन आवेदन किया और रकम उसके रायगढ़ स्थित बैंक खाते में आया, तो ‘वाद का कारण’ (Cause of Action) रायगढ़ में ही उत्पन्न होता है। तमिलनाडु की पुलिस या अदालत को ऐसे मामलों में दखल देने का नैतिक और कानूनी अधिकार सीमित है।
  1. शीर्ष अदालतों के निर्णय – ऋणी के लिए सुरक्षा कवच. :
    केवल अनुबंध का उल्लंघन (Breach of Contract) धोखाधड़ी नहीं है, जब तक कि बेईमानी का इरादा स्पष्ट न हो।
    •आपराधिक अदालतों का उपयोग नागरिक विवादों (Civil Disputes) को सुलझाने के लिए ‘दबाव के औजार’ के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
  2. बचाव पक्ष के लिए उपलब्ध कानूनी रणनीतियाँ :
    यदि आप रायगढ़ के निवासी हैं और आपको किसी सुदूर राज्य से कानूनी नोटिस या समन मिला है, तो निम्नलिखित कदम उठाएं:
    क. क्षेत्राधिकार को चुनौती :(Challenge to Jurisdiction):
    आप अपनी स्थानीय अदालत या संबंधित उस बाहरी अदालत में आवेदन दे सकते हैं कि उस अदालत को मामला सुनने का अधिकार नहीं है। डिजिटल साक्ष्यों (ID Address, बैंक स्टेटमेंट) के आधार पर यह साबित किया जा सकता है कि पूरी प्रक्रिया रायगढ़ में संपन्न हुई थी।
    ख. अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail):
    चूंकि धारा 318(4) गैर-जमानती है।
    ग. FIR को रद्द कराना (Quashing of FIR):
    यदि यह साबित कर दिया जाए कि मामला शुद्ध रूप से ‘पैसों के लेन-देन’ का है और इसे केवल परेशान करने के लिए ‘अपराधिक’ बनाया गया है, तो उच्च न्यायालय ऐसी FIR को रद्द कर सकता है।
  3. डिजिटल लेंडिंग और RBI की भूमिका : इस विषयक भारतीय रिजर्व बैंक RBI द्वारा भी समय समय पर व्यापक गाईड लाईन जारी किए गए हैं, जिसका भी अनुपालन सुनिश्चित करना अनिवार्य है जिसमें चूक होने पर बैंकिंग लोकपाल में शिकायत दर्ज करायी जा सकती है।
  4. सामाजिक और मानसिक पक्ष : डरें नहीं, जागरूक बनें
    अक्सर देखा गया है कि लोग तमिलनाडु या अन्य राज्यों की पुलिस के नाम से डर जाते हैं और गलत कदम उठा लेते हैं। याद रखें, पुलिस की शक्ति संविधान और कानून से बंधी है।
    निष्कर्ष :
    लोन लेना और उसे न चुका पाना एक आर्थिक समस्या है, सामाजिक कलंक या बड़ा अपराध नहीं। फाइनेंस कंपनियों द्वारा अपनाई जा रही ‘तमिलनाडु वाली रणनीति’ कानूनी रूप से कमजोर है। नागरिकों को चाहिए कि वे कानूनी सहायता लेने में संकोच न करें। कानून का दुरुपयोग करने वाली कंपनियों के खिलाफ उल्टा मानहानि (Defamation) और प्रताड़ना का केस भी दर्ज किया जा सकता है।
    सावधानी ही सुरक्षा है: लोन लेते समय ‘Terms and Conditions’ को ध्यान से पढ़ें और सुनिश्चित करें कि कंपनी RBI द्वारा पंजीकृत (Registered) है या नहीं। यदि विवाद होता है, तो संवाद का माध्यम ‘ ईमेल ‘ रखें ताकि आपके पास लिखित साक्ष्य मौजूद रहे।
    (यह काॅलम केवल शैक्षणिक उद्देश्य एवं ज्ञानवर्धन हेतु जारी किया गया है।)
    एस . के . घोष ,
    अधिवक्ता
    रायगढ़
    मो. 9993786929.

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