
रायगढ़/सत्ता रहने तक नशे की खुमारी नेताओं के लिए सामान्य सी बात है लेकिन सत्ता जाने के बाद भी मदहोशी के आलम में बने रहना गर्त में जाने अथवा निरंतर पतन की पहचान है । सत्ता का नशा सत्ता रहते हुए छिप जाता है लेकिन कुर्सी जाने के बाद नशा ना उतरे तो यह नशा आम जनता के सामने उजागर हो ही जाता है। जिले के एक पूर्व विधायक की शराब खोरी जन चर्चा का विषय बन चुकी है। सम्पन्न विधान सभा चुनाव प्रचार के दौरान सरकार की उपलब्धियां शराबी विधायक के मुंह से दुर्गंध के रूप महसूस की जाती रही । सही मायने में हार-जीत के इतने बड़े अंतर को देख कर लगा आम जनता इस शराबी विधायक से छुटकारा पाना चाहती है । सत्ता गई और हार भी गए लेकिन जनाब ने पीना नहीं छोड़ा । इतने बड़े ओहदे पर रह चुके व्यक्ति पर नशे की हालत में मार – पीट किए जाने का आरोप लगे तो यह कांग्रेस के लिए चिंतन का विषय होना चाहिए । भाजपा को कोसने के पहले कांग्रेस को इस शराबी नेता की समस्या का समाधान खोजना चाहिए । मार पीट के वीडियो में पूर्व विधायक की लड़खड़ाती जुबान से निकली आवाज को सुन कर यह सहज अंदाज लगाया जा सकता है कि पूर्व विधायक रहे नेता दिनदहाड़े मदहोशी के आलम में है। सरकार चली गई, अकड़ चली गई, धान खरीदी की पोल खोलने के नाम पर पूरी कांग्रेस की पोल खुल गई । लड़खड़ाते विपक्ष का नेतृत्व भी डगमगाते पैर कर रहे, इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है ? आज यह स्थिति यदि भाजपा में होती तो पूर्व विधायक को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया होता । भाजपा की खामियां उजागर करने के पहले विपक्ष यह विश्वास दिलाए कि धान खरीदी में पोल खोलने वाले शराब के नशे में थे या नहीं …?शराब के नशे में डूबे नेताओं को इतने अहम आंदोलन की जवाबदारी क्यों दी गई , विपक्ष में इसका जवाब कौन देगा ? पिछला विधान सभा चुनाव ‘किताब वर्सेज शराब’ हो गया था । यही वजह है कि कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी । सत्ता जाने के बाद भी कांग्रेस ऐसे शराबी नेताओं का मोह नहीं त्याग पाई है । आगे निगम चुनाव है , नेता जी की शराब खोरी नहीं रुकी तो बंटाधार वहां भी होना तय है…!





